"शर्मीला दोस्त"

करने को इज़हारे मोहब्बत, डरता है अपनी दिलरुबा से !


मेरा दोस्त है परेशां, कुछ यूँ अपनी ही शर्म ओ हया से !

की गुजारिशे इमदाद, हाले दिल कहने की उस दिलरुबा से !

दे कर अपने लफ्जों नज़ाक़त, करें बयां अपनी हम जुबां से !



जुबां से अपनी उनको, हाले दिल मैं दोस्त का सुनाऊं !

राज़पोशी हया की उसकी, हदे जुनूं तक भी मैं निभाऊं !

हो जाए ऐसा कुछ करिश्मा, जुड़े जुबां मेरी दिल से उसके !

आये जो भी ख़याले दिले दोस्त, दे जुबां खोल राज़ उसके !



कर्नल ( से. नि.) योगेश्वर दयाल

११ अगस्त २०१० प्रातः ०९:२०